शनिवार, 21 जून 2008

बहना चाहता हूं,,,,,,,,,,,,,,

मौत से पहले

जिंदगी को महसूस

करना चाहता हूं

रहूं ना रहूं

मैं-

विचार बनकर

धमनियों में बहना

चाहता हूं।

सूख गए

होठों पर

पानी की बूंद बन

बरसना चाहता हूं

अंधेरी, पथराई आंखों से

आंसू बनकर

बहना चाहता हूं।

आंत की चुभन को

कुंद-

करना चाहता हूं

पलकों के पीछे की

निराशाओं

के बीच

उनमें आशा बनकर

सोना चाहता हूं

धूप की तपिश के

बाद

मंद बयार बनकर

बहना चाहता हूं।

हर जिंदगी का

आखिर

मौत होती है

उस मौत के बाद

इक इंसान बन

पैदा होना चाहता हूं ।

मौत से पहले

जिंदगी को महसूस

करना चाहता हूं

रहूं ना रहूं

मैं-

विचार बनकर

हर किसी की

धमनियों में बहना चाहता हूं।

सूखी छातियों के

दरमियां

नम सांस बन

चलना चाहता हूं

हर किसी के

साथ

दो पल का

अहसास बन

जीना चाहता हूं।

मंद पड़े दिलों में

धड़कनों की रफ़तार

बनना चाहता हूं।

मौला से अपनी

गुजारिश की दुनिया

मांगना चाहता हूं

रहूं ना रहूं मैं,,,,,,,,,,,,,,,

पंख

लेबल:

मेरी पसंद

न था कुछ,

तो खुदा था

कुछ

न होता

तो

खुदा होता

डुबोया मुझको

होने ने

न होता

मैं

तो

क्‍या होता,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

गालिब

मेरे गीत,,,,

मेरे गीत

यूं ही

गुनगुनाते रहना।

हमें भूल जाना

पर हमें

याद आते रहना।

पंख

लेबल:

जाने कब,,,,,,

जाने कब

किस घड़ी

जिंदगी की

शाम हो जाए

आखिरी आरजू है

बस यही

कि-

तेरे आगोश में

सांसों को

ऐहतराम मिल जाय

ऐ! खुदा

मेरी रूह को

तेरी बाहों में

पनाह मिल जाय।।

'पंख'

लेबल:

शुक्रवार, 20 जून 2008

अधूरा,,,,,,,,,,,,,,,,, भाग एक

यहां हर अरमा

पूरा कहां हो पाता है

मौत तो पूरी है

पर उसके पहले

बहुत कुछ

अधूरा रह जाता है ।

वक्‍त का घूमता पहिया

घूमता ही जाता है

हर दुआ-बद्दुआ को

कुचलता ही जाता है

अपनों को गैर

बनाता जाता है

हर साया पीछे छूटता

और

छूटता रह जाता है

कहीं कुछ अधूरा रह जाता है।

जख्‍म भरता

तो है

पर अंदर ही अंदर

पस भरता ही रह जाता है

और

ऊपर इक निशान

छूट जाता है

यहां हर अरमा

पूरा कहां हो पाता है

कहीं कुछ अधूरा रह जाता है ।

लेबल: ,

जागो फिर एक बार

जागो फिर एक
बार देखो क्‍या कह रही है
ये वक्‍त की बयार
आओ
मेरा सीना चीर के
भरो
एक नई हुंकार
जागो फिर एक बार
कितना भी ये
दुनियावी सर्प
फुंफकारे बार-बार
कुचल के रख दो
इसके फण को
कर दो इसके
विष को तार तार
जागो फिर एक बार।
आंखों की कोठरियां
पसलियों की टोकरियां
पेटों की अंतडि़यां
बंजरे-जमीन की बेवाइयां
पुकारती हैं बार- बार
जागो फिर एक बार
तो क्‍यूं हंसते हो
क्‍यूं शर्माते हो
क्‍यूं चेहरा छिपाते हो
क्‍यूं कोसते हो
उनको हर बार
दिखा दो कि
तुम आ गए हो
मेरे यार जागो
फिर एक बार।।

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1- गालिब ने

गालिब ने सब कुछ कह दिया यूं ही
मेहरबानों !
तुम्‍हें मेरे कहने पर रंज है क्‍यूं ,
आज फिर से आसमां
जमीं से सिमटना चाहता है
समुंदर की गहराइयों में
खो जाना चाहता है
चोटियों की ऊंचाइयों को
चूमना चाहता है
तल पर दौड़ना
चाहता है
फूलों से अठखेलियां
करना चाहता है
परागों से गंध
चुराना चाहता है
भौरों को मात
देना चाहता है
तितलियों से रंग
चुराना चाहता है
प्‍यासे होठों पर
फिर से बरसना चाहता है
आंखों की खाइयां को
वो भरना चाहता है
जर्जर डंडियों को
काबिल बनाना चाहता है
पगडंडियों पर बैठकर
वो मुस्‍कुराना चाहता है
गालिब ने
सब कुछ कह दिया यूं ही
ओ मेहरबानों !
आज ये नाचीज भी
कुछ कहना चाहता है ।।
नितेश मिश्रा

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