रविवार, 28 मार्च 2010

ये क्या हो गया है काशी को,,,,,,,,

जहां तीन साल कि मासूम के साथ दुष्कर्म कर उसे चाकुओं से गोदकर मर दिया जाता है और कोई हलचल नहीं होती,,,,,,,,
वाराणसी से नितेश मिश्रा
पिछले आठ महीनों से मैं तीर्थ नगरी काशी में सक्रिय पत्रकारिता में हूँ. लेकिन यहाँ का माहौल देखने के बाद बड़ी ग्लानी महसूस हुयी. ये वो शहर जो अपनी संस्कृति, ज्ञान, ध्यान, योग, देवी-देवताओं व मां गंगा की पवित्रता व पूजन के लिए विख्यात है. लेकिन पिछले दिनों इस शहर में हुयी कुछ ह्रदय विदारक घटनाओं ने संवेदशील मन को झकझोर कर रख दिया. बीते दिनों शहर में मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया गया. उनमे से कुछ को बुरी तरह चाकू और पेंचकस से गोदकर मर डाला गया. लेकिन घाट पर साबुन लगाने की मनाही पर हल्ला मचने वाला ये शहर इन बच्चियों की दर्दनाक मौत और उनसे किये सलूक पर खामोश रहा. किसी भी धरम का कोई गुरु या धर्माचार्य या काशी समाज के तथाकथित ठेकेदार सामने नहीं आये. इसका क्या मतलब समझें की काशी की सारी संवेदना और नैतिकता मर चुकी है. फिजूल के मुद्दों पर राग अलापने के अलावा यहाँ के लोगों को दिखाई और सुनाई नहीं देता. बड़ा आश्चर्य हुआ यह देखकर की तमाम सामाजिक सुधारों का दावा करनेवाले संगठनों में तनिक सी हलचल नहीं दिखाई दी. और पत्रकार बिरादरी को पेशे से ही फुर्सत नहीं की कुछ कर या कह सकें. कलम तोड़ी पर उसका कोई असर नहीं. पत्रकारिता के लिखे जानेवाले स्तम्भ अब कलम तक सीमित होकर रह गए हैं. यही कारण है की समाज के किसी तबके पर कोई असर नहीं होता. गैरकानूनी गतिविधियां धड़ल्ले से जरी हैं. चाहे मन हो या मंदिर,,, मस्जिद हो,,, चर्च हो या गुरुद्वारा. गंगा और गंगा के घाट तो पहले से ही इतने प्रदूषित किये जा चुके हैं कि उसके बारे में चर्चा करना बेमानी है. ना प्रशासन सहित सरकारों को होश है. ना ही यहाँ कि आम या खास जनता को,,, जो अपने किये जा कुकर्मों को ढकने के अलावा कुछ करते ही नहीं. आखिर क्या हो गया है काशी को,,,,कौन देगा इस सवाल का जवाब,,, शयद हमें ही ढूँढना होगा इसका समाधान,,,नहीं तो आगे स्थिति भयानक हो सकती है. नहीं तो बस यही गुनगुनाते रहेंगे कि गंगा मैली हो गयी पापियों के पाप धोते-धोते. इस पर भी न मिटा पाप न मिटे पापी.

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बुधवार, 12 अगस्त 2009

स्वाइन फ्लू पर बवाल क्यों, देश में हैं और भी खबरें

-बाज़ार का खेल है स्वाइन फ्लू
एक अरब से ऊपर की आबादी वाले देश में स्वाइन फ्लू से ११ लोग मर चुके हैं. और मीडिया ने इसे इतना ज्यादा कवरेज दे रहा है मानो कोई इतनी बड़ी महामारी फैलने वाली है कि सारा देश मौत के मुहाने पर खड़ा है.ये क्या है और ऐसा क्यों किया जा रहा है? जबकि हमारे देश में इससे बड़ी खबरें भी हैं जैसे भूख से मरने वालों कि संख्या स्वाइन से मरने वालों से कई गुनी है. मैं ये नहीं कहता की स्वाइन फ्लू के बारे में खबर देना और ख़बरदार करना गलत है.पर इसे इतने सनसनी तरीके से पेश करना कहाँ तक न्यायसंगत और तर्कसंगत है.सामयिकता को देखें देश के कई भाग ऐसे हैं जो सूखे, महगाई, भुखमरी और अकाल आदि समस्याओं से ग्रस्त हैं.इनसे मरने वालों की संख्या स्वाइन फ्लू से मरने वालों की संख्या से कई गुनी है.इस समय अगर सरकारी आकड़ों की माने तो खरीफ की बुवाई में बीस प्रतिशत की कमी आई है.पर यह तो आकड़ा मात्र है इस कमी से जूझने वाला आम आदमी कैसे खायेगा आने वाले समय में दाल और चावल. और हालत देखते हुए रोटी भी महंगी होने के पूरे आसार हैं.ये सारी चीजें माध्यम वर्ग की तो कमर तोड़ ही देंगी और साथ ही कितनो की मौत का कारण बनेंगी.इसका जवाब दे पाना अभी मुश्किल है.पर स्वाइन फ्लू पर पर चल रहा हल्ला तो कुछ चंद मुट्ठीभर लोगों का स्वार्थ पूरा होते ही शायद शांत हो जाय.[मेरे कहने का मतलब है की शायद ये बाज़ार की ही देन है जिसके नाते मीडिया उछल उछल कर इसकी खबरें दे रहा है.] लेकिन भूख से, सूखे से और अकाल से मरने वाले हजारों की कौन सुनेगा कौन कहेगा. स्वाइन फ्लू का मरीज़ लीलावती अस्पताल में भर्ती होकर मरता है और भूख से मरने वाली लीलावती को एक निवाला नहीं नसीब होता कि वो अपनी जिन्दगी बचा सके.आज हम स्वतंत्र हैं तो शायद इसमें कहीं हद तक मीडिया का योगदान है. पर आज का मीडिया पूरी तरह बाज़ार का रखैल बन अपनी संवेदनशीलता खो चुका है. उसे दस मरनेवाले तो दिखते हैं पर हजारों मौतों पर वह चुप है ज्यादा बहस होने पर जवाब मिलता है की ये तो रोज़ की बात है.

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रविवार, 26 जुलाई 2009

मेरे पंख,,,,,,,,,

मेरे पंख अब
उड़ने लगे हैं
सपनों की
हकीकत अब पहचानने
लगे हैं
देखकर दुनिया की रंगत
अब वो भी
अपनी रंगत
बदलने लगे हैं
जो हो रहा है
इधर उधर
उसको भी महसूस
करने लगे हैं
मेरे पंख अब
उड़ने लगे हैं.
आज मुद्दतों बाद
ये जहरीली हवा में
फिर से साँस लेने लगे हैं
सपनों को
हकीकत से मिलाकर
अब ये नए सपने
बुनने लगे हैं
दुनिया के
नुकीले जबड़ों से बचकर
ये पैरों पर भी
चलना सीखने लगे हैं
मेरे पंख अब उड़ने लगे हैं.

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कुछ का,,,,,,

सपनों की जंग में
हम जीत गए
पर
हकीकत में ऐसे हारे
कि-
जीने की तमन्ना भी
न रही
तमन्ना थी
कुछ करने की
पर-
उस कुछ का पीछा
करते करते आ गए
हम वहां जहाँ न आगे
रास्ता था
न पीछे
आखिर वो कुछ
क्या था
कि-
हम आ गए ऐसे मोड़ पर
जहाँ
कोई रास्ता ही न था
फिर हौले से पड़े पड़े
इक ख़याल
आया हम ही नहीं
इक
ऐसे जो कुछ का
पीछा कर रहे
ऐसे बहुत मिलेंगे काबिल
जो पीछा करते रहे
कुछ का चले गए
उन्हें न मिला कुछ
तो कहना है
इस ग़ालिब का
कि-
ऐ दोस्तों न जाओ
कुछ के पीछे
तलाशो अंतस को
वहीँ मिलेगा कुछ नहीं
बहुत कुछ.काबिले
गौर है
तुम में ही है बहुत कुछ..

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शब्दों का,,,,,,,,,,,

अभी तो ये
शुरुआत है
लड़ने को पाने को
अभी बाकी है
बहुत-
पर पाना है क्या
ये पता ही नहीं
शब्दों का
खेल चल रहा है
सहमा सहमा सा
भारत देख रहा है
हरियाली की आस में
सूखे का दर्रा
सूखता ही जा रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
अन्दर का इंसान मर रहा है
भूख का दरिया
बढ़ रहा है
पानी का दरिया
सूख रहा है
धरती का सीना
फट रहा है
इंसान का सीना
भट रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
आबरू का बाजार
चल रहा है
हर कोई देखकर भी
अंजान बना जा रहा है
रोकने को कौन कहे
शब्दों का खेल
चल रहा है
कभी पापी पेट
तो-
कभी बढ़ती हवस से
मजबूर इंसान
समझौते पर समझौता
करता जा रहा है
बस,
शब्दों का खेल चल रहा है.

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मंगलवार, 19 अगस्त 2008

हो दिल खुश जहां,,,,,,,,,

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

अब वहीं पे चल

दिल यहां लगता ही नहीं

ढूंढ रहा दिल

सिर्फ़ हसीं रूमानियत के पल

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

अब वहीं पे चल।

ये दुनिया समेटे लगती है

सिर्फ़ ग़मों के पल

सांसों का कारवां

घुट रहा हर पल

धड़कनों का जहां

रुक रुक कर रहा है

चल

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

और

महसूस हो

रूह की हलचल

वहीं पे चल।

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रविवार, 6 जुलाई 2008

बाकी है,,,,,,,

अभी तो उठाया है जाम

पूरा पैमाना अभी बाकी है

चले अभी हैं चंद कदम

हजार कदमों का

सफर अभी बाकी है।

अभी शूटिंग

खतम नहीं हुई है

यारों पिक्‍चर का

रिलीज होना

अभी बाकी है,,,,,,,,,,,,,,,

समझने वाले

समझ गए हैं

ना समझने वालों का

-समझना

अभी बाकी है।

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