ये क्या हो गया है काशी को,,,,,,,,
जहां तीन साल कि मासूम के साथ दुष्कर्म कर उसे चाकुओं से गोदकर मर दिया जाता है और कोई हलचल नहीं होती,,,,,,,,
वाराणसी से नितेश मिश्रा
पिछले आठ महीनों से मैं तीर्थ नगरी काशी में सक्रिय पत्रकारिता में हूँ. लेकिन यहाँ का माहौल देखने के बाद बड़ी ग्लानी महसूस हुयी. ये वो शहर जो अपनी संस्कृति, ज्ञान, ध्यान, योग, देवी-देवताओं व मां गंगा की पवित्रता व पूजन के लिए विख्यात है. लेकिन पिछले दिनों इस शहर में हुयी कुछ ह्रदय विदारक घटनाओं ने संवेदशील मन को झकझोर कर रख दिया. बीते दिनों शहर में मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया गया. उनमे से कुछ को बुरी तरह चाकू और पेंचकस से गोदकर मर डाला गया. लेकिन घाट पर साबुन लगाने की मनाही पर हल्ला मचने वाला ये शहर इन बच्चियों की दर्दनाक मौत और उनसे किये सलूक पर खामोश रहा. किसी भी धरम का कोई गुरु या धर्माचार्य या काशी समाज के तथाकथित ठेकेदार सामने नहीं आये. इसका क्या मतलब समझें की काशी की सारी संवेदना और नैतिकता मर चुकी है. फिजूल के मुद्दों पर राग अलापने के अलावा यहाँ के लोगों को दिखाई और सुनाई नहीं देता. बड़ा आश्चर्य हुआ यह देखकर की तमाम सामाजिक सुधारों का दावा करनेवाले संगठनों में तनिक सी हलचल नहीं दिखाई दी. और पत्रकार बिरादरी को पेशे से ही फुर्सत नहीं की कुछ कर या कह सकें. कलम तोड़ी पर उसका कोई असर नहीं. पत्रकारिता के लिखे जानेवाले स्तम्भ अब कलम तक सीमित होकर रह गए हैं. यही कारण है की समाज के किसी तबके पर कोई असर नहीं होता. गैरकानूनी गतिविधियां धड़ल्ले से जरी हैं. चाहे मन हो या मंदिर,,, मस्जिद हो,,, चर्च हो या गुरुद्वारा. गंगा और गंगा के घाट तो पहले से ही इतने प्रदूषित किये जा चुके हैं कि उसके बारे में चर्चा करना बेमानी है. ना प्रशासन सहित सरकारों को होश है. ना ही यहाँ कि आम या खास जनता को,,, जो अपने किये जा कुकर्मों को ढकने के अलावा कुछ करते ही नहीं. आखिर क्या हो गया है काशी को,,,,कौन देगा इस सवाल का जवाब,,, शयद हमें ही ढूँढना होगा इसका समाधान,,,नहीं तो आगे स्थिति भयानक हो सकती है. नहीं तो बस यही गुनगुनाते रहेंगे कि गंगा मैली हो गयी पापियों के पाप धोते-धोते. इस पर भी न मिटा पाप न मिटे पापी.
लेबल: ये क्या है????

