शुक्रवार, 20 जून 2008

1- गालिब ने

गालिब ने सब कुछ कह दिया यूं ही
मेहरबानों !
तुम्‍हें मेरे कहने पर रंज है क्‍यूं ,
आज फिर से आसमां
जमीं से सिमटना चाहता है
समुंदर की गहराइयों में
खो जाना चाहता है
चोटियों की ऊंचाइयों को
चूमना चाहता है
तल पर दौड़ना
चाहता है
फूलों से अठखेलियां
करना चाहता है
परागों से गंध
चुराना चाहता है
भौरों को मात
देना चाहता है
तितलियों से रंग
चुराना चाहता है
प्‍यासे होठों पर
फिर से बरसना चाहता है
आंखों की खाइयां को
वो भरना चाहता है
जर्जर डंडियों को
काबिल बनाना चाहता है
पगडंडियों पर बैठकर
वो मुस्‍कुराना चाहता है
गालिब ने
सब कुछ कह दिया यूं ही
ओ मेहरबानों !
आज ये नाचीज भी
कुछ कहना चाहता है ।।
नितेश मिश्रा

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