हो दिल खुश जहां,,,,,,,,,
चल मुसाफिर चल
हो दिल खुश जहां
अब वहीं पे चल
दिल यहां लगता ही नहीं
ढूंढ रहा दिल
सिर्फ़ हसीं रूमानियत के पल
चल मुसाफिर चल
हो दिल खुश जहां
अब वहीं पे चल।
ये दुनिया समेटे लगती है
सिर्फ़ ग़मों के पल
सांसों का कारवां
घुट रहा हर पल
धड़कनों का जहां
रुक रुक कर रहा है
चल
चल मुसाफिर चल
हो दिल खुश जहां
और
महसूस हो
रूह की हलचल
वहीं पे चल।
लेबल: रूह की हलचल


3 टिप्पणियाँ:
बहुत खूब.
बेहतरीन..... उम्दा....
काम भी कर रहे हो या केवल मुसाफिर को ही चला रहे हो.... वैसे बहुत अच्छा लिखा है
चल मुसाफिर चल
हो दिल खुश जहां
अब वहीं पे चल
वाह नितेश जी ,बहुत खूब ,कयाक बात है .
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