मंगलवार, 19 अगस्त 2008

हो दिल खुश जहां,,,,,,,,,

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

अब वहीं पे चल

दिल यहां लगता ही नहीं

ढूंढ रहा दिल

सिर्फ़ हसीं रूमानियत के पल

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

अब वहीं पे चल।

ये दुनिया समेटे लगती है

सिर्फ़ ग़मों के पल

सांसों का कारवां

घुट रहा हर पल

धड़कनों का जहां

रुक रुक कर रहा है

चल

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

और

महसूस हो

रूह की हलचल

वहीं पे चल।

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3 टिप्पणियाँ:

यहां 19 अगस्त 2008 को 3:38 am बजे, Blogger बालकिशन ने कहा…

बहुत खूब.
बेहतरीन..... उम्दा....

 
यहां 19 अगस्त 2008 को 3:46 am बजे, Blogger Rajesh Roshan ने कहा…

काम भी कर रहे हो या केवल मुसाफिर को ही चला रहे हो.... वैसे बहुत अच्छा लिखा है

 
यहां 22 दिसंबर 2008 को 7:23 am बजे, Blogger अमिताभ भूषण"अनहद" ने कहा…

चल मुसाफिर चल

हो दिल खुश जहां

अब वहीं पे चल
वाह नितेश जी ,बहुत खूब ,कयाक बात है .

 

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