रविवार, 26 जुलाई 2009

मेरे पंख,,,,,,,,,

मेरे पंख अब
उड़ने लगे हैं
सपनों की
हकीकत अब पहचानने
लगे हैं
देखकर दुनिया की रंगत
अब वो भी
अपनी रंगत
बदलने लगे हैं
जो हो रहा है
इधर उधर
उसको भी महसूस
करने लगे हैं
मेरे पंख अब
उड़ने लगे हैं.
आज मुद्दतों बाद
ये जहरीली हवा में
फिर से साँस लेने लगे हैं
सपनों को
हकीकत से मिलाकर
अब ये नए सपने
बुनने लगे हैं
दुनिया के
नुकीले जबड़ों से बचकर
ये पैरों पर भी
चलना सीखने लगे हैं
मेरे पंख अब उड़ने लगे हैं.

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कुछ का,,,,,,

सपनों की जंग में
हम जीत गए
पर
हकीकत में ऐसे हारे
कि-
जीने की तमन्ना भी
न रही
तमन्ना थी
कुछ करने की
पर-
उस कुछ का पीछा
करते करते आ गए
हम वहां जहाँ न आगे
रास्ता था
न पीछे
आखिर वो कुछ
क्या था
कि-
हम आ गए ऐसे मोड़ पर
जहाँ
कोई रास्ता ही न था
फिर हौले से पड़े पड़े
इक ख़याल
आया हम ही नहीं
इक
ऐसे जो कुछ का
पीछा कर रहे
ऐसे बहुत मिलेंगे काबिल
जो पीछा करते रहे
कुछ का चले गए
उन्हें न मिला कुछ
तो कहना है
इस ग़ालिब का
कि-
ऐ दोस्तों न जाओ
कुछ के पीछे
तलाशो अंतस को
वहीँ मिलेगा कुछ नहीं
बहुत कुछ.काबिले
गौर है
तुम में ही है बहुत कुछ..

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शब्दों का,,,,,,,,,,,

अभी तो ये
शुरुआत है
लड़ने को पाने को
अभी बाकी है
बहुत-
पर पाना है क्या
ये पता ही नहीं
शब्दों का
खेल चल रहा है
सहमा सहमा सा
भारत देख रहा है
हरियाली की आस में
सूखे का दर्रा
सूखता ही जा रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
अन्दर का इंसान मर रहा है
भूख का दरिया
बढ़ रहा है
पानी का दरिया
सूख रहा है
धरती का सीना
फट रहा है
इंसान का सीना
भट रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
आबरू का बाजार
चल रहा है
हर कोई देखकर भी
अंजान बना जा रहा है
रोकने को कौन कहे
शब्दों का खेल
चल रहा है
कभी पापी पेट
तो-
कभी बढ़ती हवस से
मजबूर इंसान
समझौते पर समझौता
करता जा रहा है
बस,
शब्दों का खेल चल रहा है.

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