अधूरा,,,,,,,,,,,,,,,,, भाग एक
यहां हर अरमा
पूरा कहां हो पाता है
मौत तो पूरी है
पर उसके पहले
बहुत कुछ
अधूरा रह जाता है ।
वक्त का घूमता पहिया
घूमता ही जाता है
हर दुआ-बद्दुआ को
कुचलता ही जाता है
अपनों को गैर
बनाता जाता है
हर साया पीछे छूटता
और
छूटता रह जाता है
कहीं कुछ अधूरा रह जाता है।
जख्म भरता
तो है
पर अंदर ही अंदर
पस भरता ही रह जाता है
और
ऊपर इक निशान
छूट जाता है
यहां हर अरमा
पूरा कहां हो पाता है
कहीं कुछ अधूरा रह जाता है ।
लेबल: किसी को जमीं, तो


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