रविवार, 26 जुलाई 2009

कुछ का,,,,,,

सपनों की जंग में
हम जीत गए
पर
हकीकत में ऐसे हारे
कि-
जीने की तमन्ना भी
न रही
तमन्ना थी
कुछ करने की
पर-
उस कुछ का पीछा
करते करते आ गए
हम वहां जहाँ न आगे
रास्ता था
न पीछे
आखिर वो कुछ
क्या था
कि-
हम आ गए ऐसे मोड़ पर
जहाँ
कोई रास्ता ही न था
फिर हौले से पड़े पड़े
इक ख़याल
आया हम ही नहीं
इक
ऐसे जो कुछ का
पीछा कर रहे
ऐसे बहुत मिलेंगे काबिल
जो पीछा करते रहे
कुछ का चले गए
उन्हें न मिला कुछ
तो कहना है
इस ग़ालिब का
कि-
ऐ दोस्तों न जाओ
कुछ के पीछे
तलाशो अंतस को
वहीँ मिलेगा कुछ नहीं
बहुत कुछ.काबिले
गौर है
तुम में ही है बहुत कुछ..

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2 टिप्पणियाँ:

यहां 26 जुलाई 2009 को 6:36 am बजे, Blogger M VERMA ने कहा…

तुम में ही है बहुत कुछ..
सही कहा है तुममे ही है सबकुछ
बहुत सुन्दर

 
यहां 26 जुलाई 2009 को 5:42 pm बजे, Blogger Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही!!

 

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