स्वाइन फ्लू पर बवाल क्यों, देश में हैं और भी खबरें
-बाज़ार का खेल है स्वाइन फ्लू
एक अरब से ऊपर की आबादी वाले देश में स्वाइन फ्लू से ११ लोग मर चुके हैं. और मीडिया ने इसे इतना ज्यादा कवरेज दे रहा है मानो कोई इतनी बड़ी महामारी फैलने वाली है कि सारा देश मौत के मुहाने पर खड़ा है.ये क्या है और ऐसा क्यों किया जा रहा है? जबकि हमारे देश में इससे बड़ी खबरें भी हैं जैसे भूख से मरने वालों कि संख्या स्वाइन से मरने वालों से कई गुनी है. मैं ये नहीं कहता की स्वाइन फ्लू के बारे में खबर देना और ख़बरदार करना गलत है.पर इसे इतने सनसनी तरीके से पेश करना कहाँ तक न्यायसंगत और तर्कसंगत है.सामयिकता को देखें देश के कई भाग ऐसे हैं जो सूखे, महगाई, भुखमरी और अकाल आदि समस्याओं से ग्रस्त हैं.इनसे मरने वालों की संख्या स्वाइन फ्लू से मरने वालों की संख्या से कई गुनी है.इस समय अगर सरकारी आकड़ों की माने तो खरीफ की बुवाई में बीस प्रतिशत की कमी आई है.पर यह तो आकड़ा मात्र है इस कमी से जूझने वाला आम आदमी कैसे खायेगा आने वाले समय में दाल और चावल. और हालत देखते हुए रोटी भी महंगी होने के पूरे आसार हैं.ये सारी चीजें माध्यम वर्ग की तो कमर तोड़ ही देंगी और साथ ही कितनो की मौत का कारण बनेंगी.इसका जवाब दे पाना अभी मुश्किल है.पर स्वाइन फ्लू पर पर चल रहा हल्ला तो कुछ चंद मुट्ठीभर लोगों का स्वार्थ पूरा होते ही शायद शांत हो जाय.[मेरे कहने का मतलब है की शायद ये बाज़ार की ही देन है जिसके नाते मीडिया उछल उछल कर इसकी खबरें दे रहा है.] लेकिन भूख से, सूखे से और अकाल से मरने वाले हजारों की कौन सुनेगा कौन कहेगा. स्वाइन फ्लू का मरीज़ लीलावती अस्पताल में भर्ती होकर मरता है और भूख से मरने वाली लीलावती को एक निवाला नहीं नसीब होता कि वो अपनी जिन्दगी बचा सके.आज हम स्वतंत्र हैं तो शायद इसमें कहीं हद तक मीडिया का योगदान है. पर आज का मीडिया पूरी तरह बाज़ार का रखैल बन अपनी संवेदनशीलता खो चुका है. उसे दस मरनेवाले तो दिखते हैं पर हजारों मौतों पर वह चुप है ज्यादा बहस होने पर जवाब मिलता है की ये तो रोज़ की बात है.

