रविवार, 26 जुलाई 2009

शब्दों का,,,,,,,,,,,

अभी तो ये
शुरुआत है
लड़ने को पाने को
अभी बाकी है
बहुत-
पर पाना है क्या
ये पता ही नहीं
शब्दों का
खेल चल रहा है
सहमा सहमा सा
भारत देख रहा है
हरियाली की आस में
सूखे का दर्रा
सूखता ही जा रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
अन्दर का इंसान मर रहा है
भूख का दरिया
बढ़ रहा है
पानी का दरिया
सूख रहा है
धरती का सीना
फट रहा है
इंसान का सीना
भट रहा है
शब्दों का खेल
चल रहा है
आबरू का बाजार
चल रहा है
हर कोई देखकर भी
अंजान बना जा रहा है
रोकने को कौन कहे
शब्दों का खेल
चल रहा है
कभी पापी पेट
तो-
कभी बढ़ती हवस से
मजबूर इंसान
समझौते पर समझौता
करता जा रहा है
बस,
शब्दों का खेल चल रहा है.

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